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एनजीटी की रोक के बावजूद बालू का खेल? जयराम महतो-पुलिस विवाद ने उठाए बड़े सवाल

श्रीवास्तव रांची, सितंबर 13: झारखंड में मानसून के दौरान नदी से बालू उठाव पर लागू मौसमी रोक के बावजूद बालू लदे ट्रैक्टरों…

एनजीटी की रोक के बावजूद बालू का खेल? जयराम महतो-पुलिस विवाद ने उठाए बड़े सवाल

श्रीवास्तव

रांची, सितंबर 13: झारखंड में मानसून के दौरान नदी से बालू उठाव पर लागू मौसमी रोक के बावजूद बालू लदे ट्रैक्टरों के लगातार परिचालन के आरोपों ने प्रशासन की निगरानी और कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्थिति राज्य में अवैध बालू खनन, परिवहन और आपूर्ति के संभावित नेटवर्क की ओर भी संकेत करती है।

मामला उस समय और चर्चा में आ गया जब झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के विधायक जयराम महतो और पुलिस के बीच एक पुलिस अधिकारी के साथ कथित तौर पर अभद्र फोन बातचीत को लेकर विवाद तेज हो गया।

पुलिस एसोसिएशन जहां विधायक के कथित व्यवहार को लेकर कार्रवाई की मांग कर रहा है, वहीं जयराम महतो ने आरोप लगाया है कि पुलिसकर्मी बालू लदे ट्रैक्टरों से पैसे की मांग कर रहे थे। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

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हालांकि, इस विवाद ने अनजाने में एक बड़े और महत्वपूर्ण सवाल को सामने ला दिया है—यदि मानसून के दौरान नदी से बालू उठाव प्रतिबंधित है, तो बालू लदे ट्रैक्टर लगातार कैसे चल रहे हैं? यह बालू कहां से आ रहा है और प्रशासन इसे रोकने में विफल क्यों रहा है?

15 अक्टूबर तक बालू उठाव पर रोक

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झारखंड में मानसून के दौरान नदी से बालू खनन और उठाव पर मौसमी रोक लागू है। राज्य में 10 जून से 15 अक्टूबर तक नदी से बालू उठाने पर प्रतिबंध रहता है।

इस प्रतिबंध का उद्देश्य बरसात के मौसम में नदी तल से अनियंत्रित बालू निकासी को रोकना और नदी की पारिस्थितिकी की रक्षा करना है। इस रोक को प्रभावी ढंग से लागू करने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन और खनन विभाग की है। अवैध खनन और बालू के अवैध परिवहन के खिलाफ कार्रवाई भी इन्हीं एजेंसियों को करनी है।

इसके बावजूद राज्य के विभिन्न हिस्सों से अवैध रूप से बालू उठाव और परिवहन की शिकायतें सामने आती रही हैं।

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चिंता केवल उन ट्रैक्टर चालकों तक सीमित नहीं है जो प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहे हैं। यदि नियमित रूप से वाहन बालू लेकर चल रहे हैं, तो इससे इस कारोबार में खनन, परिवहन, भंडारण और बिक्री से जुड़ा एक व्यापक नेटवर्क होने की आशंका पैदा होती है।

जयराम महतो प्रकरण से सामने आया सवाल

डुमरी विधायक जयराम महतो और पुलिस के बीच चल रहे विवाद ने इस अपेक्षाकृत छिपे हुए कारोबार की ओर ध्यान खींचा है।

महतो ने आरोप लगाया है कि पुलिसकर्मी बालू लदे ट्रैक्टरों से पैसे वसूल रहे थे। ये आरोप बालू लदे वाहनों की आवाजाही से जुड़े हैं और अब विधायक तथा पुलिस के बीच चल रहे राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का हिस्सा बन चुके हैं।

दूसरी ओर, झारखंड पुलिस एसोसिएशन ने एक पुलिस अधिकारी के साथ विधायक के कथित अभद्र व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

इन दोनों मुद्दों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

किसी पुलिस अधिकारी के साथ कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल की जांच उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत की जा सकती है। लेकिन बालू लदे ट्रैक्टरों से जुड़े आरोप एक अलग प्रशासनिक सवाल खड़ा करते हैं—जब नदी से बालू उठाव पर प्रतिबंध है, तब ये वाहन चल कैसे रहे हैं?

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज

इस बीच जयराम महतो के राजनीतिक विरोधियों ने भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बालू लदे ट्रैक्टरों की आवाजाही में विधायक की रुचि के पीछे आर्थिक हित हो सकते हैं।

कुछ आलोचकों ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि विधायक या उनसे जुड़े लोगों का बालू कारोबार में हिस्सा हो सकता है।

हालांकि, ऐसे आरोपों को तथ्य के रूप में स्वीकार करने के बजाय दस्तावेजी और वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर जांच की जरूरत है। वाहनों के स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड, परिवहन दस्तावेज, वित्तीय लेन-देन, कॉल रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयान इस बात की पड़ताल में मदद कर सकते हैं कि कहीं इस कारोबार का कोई राजनीतिक या प्रशासनिक गठजोड़ तो नहीं है।

दुल्लू महतो ने आर्थिक हितों की ओर किया इशारा

धनबाद के सांसद दुल्लू महतो ने भी इस विवाद को नया आयाम देते हुए संकेत दिया है कि पूरे मामले के पीछे आर्थिक हितों का पहलू हो सकता है।

धनबाद में उन्होंने कहा कि जयराम महतो द्वारा उठाए जा रहे सवालों और उसके बाद पैदा हुए विवाद का संबंध पैसों की लड़ाई से भी हो सकता है।

उन्होंने टोल गेट का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार दो-तीन वाहनों को रोकने के बाद मामला सुलझ जाता है। कथित बालू चोरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने संकेत दिया कि यदि किसी मामले में समझौता नहीं हुआ हो, तो यह बाद में विवाद और सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप का एक कारण हो सकता है।

दुल्लू महतो ने कथित अवैध खनन को लेकर प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि जब कोयला, लोहा और बालू चोरी के आरोप सामने आते हैं, तो प्रशासन को पूरी तरह संदेह से परे नहीं माना जा सकता। उन्होंने ऐसे आरोपों की जांच की मांग की।

सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार राजनीतिक नेता ऐसे मामलों में तब आवाज उठाना शुरू करते हैं, जब उन्हें कथित तौर पर कारोबार में अपना हिस्सा नहीं मिलता।

असली सवाल—बालू आ कहां से रहा है?

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच मूल सवाल दबना नहीं चाहिए।

यदि 15 अक्टूबर तक नदी से बालू उठाव पर रोक है, तो प्रतिबंध की अवधि में वाहनों के जरिए बाजार तक पहुंच रहे बालू के स्रोत की पहचान प्रशासन के लिए संभव होनी चाहिए।

जिला प्रशासन और खनन विभाग को कई सीधे सवालों के जवाब देने की जरूरत है—

  • बालू किस नदी या बालू घाट से निकाला जा रहा है?
  • क्या बालू ले जा रहे वाहनों के पास वैध परिवहन दस्तावेज हैं?
  • इन ट्रैक्टरों के मालिक कौन हैं और बालू किसे पहुंचाया जा रहा है?
  • क्या ऐसे निर्धारित स्टॉकयार्ड हैं, जहां से बालू की आपूर्ति की जा रही है?
  • प्रतिबंध की अवधि में अवैध रूप से खनन किए गए बालू से लदे कितने वाहनों को जब्त किया गया है?
  • वाहन चालकों के अलावा इस पूरे आपूर्ति नेटवर्क से जुड़े लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है?

प्रशासन की कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण

अवैध बालू खनन को केवल कानून-व्यवस्था का मामला मानना पर्याप्त नहीं होगा।

इसमें खनन विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग और पर्यावरण से संबंधित नियामक एजेंसियों की भूमिका होती है।

यदि मौसमी प्रतिबंध का उल्लंघन कर नदी तल से बालू निकाला जाता है, तो इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ राज्य को वैध राजस्व का नुकसान भी हो सकता है।

दूसरी ओर, प्रतिबंध के दौरान वैध रूप से उपलब्ध बालू की कमी अवैध कारोबारियों को अधिक कीमत वसूलने का अवसर दे सकती है। इससे यह कारोबार और अधिक आकर्षक तथा लाभदायक बन सकता है।

इसीलिए केवल सड़क पर बालू लदे ट्रैक्टरों को पकड़ना पर्याप्त नहीं है। कार्रवाई का पहला और सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बालू के स्रोत यानी नदी और खनन स्थल को बनाया जाना चाहिए।

पुलिस पर ‘वसूली’ के आरोपों की भी हो जांच

बालू लदे वाहनों से पुलिसकर्मियों द्वारा पैसे वसूले जाने का आरोप गंभीर है। केवल इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यह आरोप एक राजनीतिक विवाद के बीच सामने आया है।

लेकिन दूसरी ओर, बिना प्रमाण के इस आरोप को तथ्य भी नहीं माना जा सकता।

यदि वास्तव में ऐसी कोई व्यवस्था चल रही है, तो स्वतंत्र जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पैसा कौन वसूलता है, किससे वसूला जाता है, कितनी राशि ली जाती है और क्या यह रकम संबंधित व्यक्ति से आगे भी किसी तक पहुंचती है।

इसी तरह, यदि आरोप गलत पाया जाता है, तो जांच के माध्यम से यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।

यही मानक राजनीतिक लाभार्थियों से जुड़े आरोपों पर भी लागू होना चाहिए।

अवैध बालू कारोबार से किसे फायदा?

पूरे विवाद के केंद्र में आखिरकार झारखंड के अवैध बालू कारोबार की अर्थव्यवस्था का सवाल आता है।

यदि बालू खनन पर प्रतिबंध है, लेकिन ट्रक और ट्रैक्टर लगातार बालू लेकर चल रहे हैं, तो कोई न कोई उसका खनन कर रहा है, कोई उसका परिवहन कर रहा है और कोई उसे खरीद रहा है।

संभव है कि इस पूरी प्रक्रिया में लोडिंग, भंडारण और वितरण से जुड़े बिचौलिए भी शामिल हों।

इसलिए प्रभावी जांच केवल ट्रैक्टर चालकों को पकड़ने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जांच को पूरी आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंचना होगा—नदी किनारे से लेकर अंतिम खरीदार तक।

जयराम प्रकरण से बालू खनन का मुद्दा न दबे

किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा पुलिस अधिकारी के साथ कथित अभद्र व्यवहार का मामला कानून के तहत अलग से निपटाया जा सकता है।

लेकिन विवाद का अंत वहीं नहीं होना चाहिए।

जनहित का अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या एनजीटी से संबंधित मौसमी प्रतिबंध के बावजूद झारखंड में अवैध बालू खनन और परिवहन जारी है।

यदि प्रशासन ने नियमित रूप से छापेमारी और जब्ती की कार्रवाई की है, तो उसे कार्रवाई से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए।

यदि बड़े पैमाने पर कोई अवैध खनन नहीं हो रहा है, तो प्रशासन को यह बताना चाहिए कि प्रतिबंध का पालन कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है।

और यदि अवैध खनन जारी है, तो प्रशासन को यह बताना होगा कि कारोबार में शामिल लोगों को अब तक क्यों नहीं रोका जा सका है।

कई सवाल अब भी अनुत्तरित

जयराम महतो और पुलिस के बीच विवाद ने भले ही बालू के मुद्दे को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया हो, लेकिन इसने एक ऐसा सवाल भी उजागर किया है जो राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से कहीं बड़ा है।

यदि 15 अक्टूबर तक बालू उठाव पर रोक है, तो बाजार तक बालू पहुंच कैसे रहा है?

इसे कौन निकाल रहा है?

इसे कौन पहुंचा रहा है?

यदि आरोप सही हैं, तो इस कारोबार को जारी रखने के लिए किसे और कितना भुगतान किया जा रहा है?

और सबसे बड़ा सवाल—यदि प्रतिबंध के बावजूद अवैध बालू खनन जारी है, तो जिला प्रशासन खामोश क्यों है?

इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और सार्वजनिक किए गए कार्रवाई संबंधी आंकड़ों से ही मिल सकता है।

 

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Suman Shrivastava