सुमन श्रीवास्तव
जैसे ही पश्चिम बंगाल एक और विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, ज़्यादातर राजनीतिक बहस स्थानीय मुद्दों—गवर्नेंस, कल्याण और राजनीतिक मुकाबले—पर केंद्रित है। फिर भी, इसका असर राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है। झारखंड के लिए सवाल बुनियादी और दीर्घकालिक है: क्या यह एक औद्योगिक रूप से जीवंत पश्चिम बंगाल के बिना सार्थक विकास कर सकता है? इतिहास और अर्थशास्त्र में निहित जवाब है—नहीं।

एक ऑफ–द–रिकॉर्ड जानकारी
कुछ समय पहले झारखंड के दौरे के दौरान जापानी दूतावास के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निजी, ऑफ-द-रिकॉर्ड बातचीत में एक अहम बात कही। उन्होंने बताया कि टोक्यो में बैठा कोई भी उद्यमी विदेशी निवेश की योजना बनाते समय झारखंड के बारे में नहीं सोचता। उसकी पहली पसंद मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद और तेजी से उभरता अहमदाबाद जैसे शहर होते हैं। एक समय था जब कोलकाता भी इस सूची में प्रमुखता से शामिल रहता था।

अब यह स्थिति बदल चुकी है।
आज निवेशक कोलकाता के बारे में बहुत कम सोचते हैं, और झारखंड की चर्चा तभी होती है जब कोई निवेशक कोलकाता आता है और वहां से उसे झारखंड के भौगोलिक लाभों की जानकारी मिलती है। अगर बंगाल—जिसे कभी ‘पूरब का प्रवेश द्वार’ कहा जाता था—निवेशकों की प्राथमिकता से बाहर हो जाए, तो झारखंड में निवेश आने की संभावना भी बेहद सीमित हो जाती है।
यह टिप्पणी भले ही अनौपचारिक थी, लेकिन यह एक बड़ी आर्थिक सच्चाई को उजागर करती है।
ऐतिहासिक जुड़ाव: बंगाल प्रेसीडेंसी से झारखंड तक
झारखंड और पश्चिम बंगाल का रिश्ता बहुत पुराना और गहरा है। वर्ष 2000 में झारखंड के गठन से पहले और 1912 में बिहार बनने से भी पहले, यह पूरा क्षेत्र ब्रिटिश काल में बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था।
छोटानागपुर, संथाल परगना, सिंहभूम और पलामू जैसे इलाके कलकत्ता से शासित होते थे, जो उस समय प्रशासनिक और व्यावसायिक राजधानी था। इससे संसाधन-संपन्न झारखंड क्षेत्र और औद्योगिक-व्यापारिक केंद्र के बीच मजबूत आर्थिक और संस्थागत संबंध बने।
प्रशासनिक रूप से अलग होने के बाद भी ये संबंध समाप्त नहीं हुए। झारखंड आर्थिक रूप से लंबे समय तक कोलकाता और व्यापक बंगाल क्षेत्र से जुड़ा रहा।
कोलकाता: पूरब का प्रवेश द्वार
कई दशकों तक कोलकाता को ‘पूरब का प्रवेश द्वार’ कहा जाता था। यह पूर्वी भारत का प्रमुख बंदरगाह, वित्तीय केंद्र और निर्णय लेने का मुख्य स्थल था। व्यापार, पूंजी और औद्योगिक योजनाएं यहीं से संचालित होती थीं।
झारखंड जैसे भू-आवेष्ठित और संसाधन-संपन्न क्षेत्र के लिए यह भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। यहां से निकाले गए खनिज रेल नेटवर्क के माध्यम से कोलकाता पोर्ट तक पहुंचते थे और वहां से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जाते थे। निवेश से जुड़े बड़े फैसले भी अक्सर कोलकाता में ही लिए जाते थे।
औद्योगिक तर्क: नज़दीकी क्यों थी महत्वपूर्ण
1907 में जमशेदपुर में टाटा स्टील की स्थापना इस आपसी निर्भरता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। कच्चे माल की उपलब्धता के साथ-साथ कोलकाता की नज़दीकी ने इस स्थान को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया।
कोलकाता ने मशीनरी के आयात और तैयार स्टील के निर्यात के लिए बंदरगाह सुविधा प्रदान की। साथ ही, वित्तीय संस्थान, प्रशासनिक सहयोग और कुशल मानव संसाधन भी उपलब्ध कराए। रेल कनेक्टिविटी ने इस पूरे तंत्र को सुचारु बनाया।
जमशेदपुर कोई अलग-थलग औद्योगिक शहर नहीं था, बल्कि वह कोलकाता केंद्रित एक बड़े आर्थिक तंत्र का हिस्सा था।
इसी तरह, दामोदर वैली कॉर्पोरेशन और कोल इंडिया लिमिटेड जैसी संस्थाओं ने भी अपने मुख्यालय कोलकाता में स्थापित किए, जबकि उनके संचालन क्षेत्र मुख्य रूप से आज के झारखंड में थे।
कोलकाता से झारखंड तक उद्यम का प्रवाह
यह संबंध केवल संस्थागत स्तर तक सीमित नहीं था। कई उद्यमी भी कोलकाता से झारखंड आए और यहां उद्योग स्थापित किए।
बसंत कुमार झावर इसका प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने सीमित संसाधनों के साथ कोलकाता से रांची आकर 1960 के दशक में उषा मार्टिन की स्थापना की। यह पहल आगे चलकर देश की प्रमुख वायर रोप कंपनियों में बदल गई और रांची एक महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र के रूप में उभरा।
इसी तरह, कोलकाता आधारित कई मारवाड़ी कारोबारी परिवारों ने रांची, धनबाद और जमशेदपुर में खनन, धातु, परिवहन और सहायक उद्योगों में निवेश किया। इन उद्यमों का वित्तपोषण और प्रबंधन अक्सर कोलकाता से होता था, जिससे इसकी आर्थिक केंद्रीयता और मजबूत हुई।
यह स्पष्ट करता है कि झारखंड का औद्योगिकीकरण ऐतिहासिक रूप से बंगाल से जुड़े नेटवर्क पर निर्भर रहा है।
सांस्कृतिक निरंतरता: घाटशिला और उससे आगे
झारखंड और बंगाल का रिश्ता केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है।
घाटशिला बंगालियों की सांस्कृतिक स्मृति में एक खास स्थान रखता है। सुवर्णरेखा नदी के किनारे बसा यह स्थान परिवारों, लेखकों और कलाकारों के लिए पसंदीदा स्थल रहा है। प्रसिद्ध लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय ने यहां समय बिताया, जिससे इसकी सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई।
रांची का टैगोर हिल ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर से जुड़ा है, जो इस क्षेत्र को बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण से जोड़ता है।
करमाटाड़ में ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने शिक्षा और समाज सुधार का कार्य किया, जबकि चतरा क्षेत्र का संबंध राजा राममोहन राय से रहा। देवघर का संबंध श्री अरबिंदो से जुड़ा है, जहां उन्होंने अलीपुर बम कांड के बाद कुछ समय बिताया था। धनबाद का तोपचांची इलाका अभिनेता उत्तम कुमार की स्मृतियों से जुड़ा है।
पलामू के जंगलों में विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के अनुभवों को अक्सर उनकी रचनात्मकता से जोड़ा जाता है, जिससे झारखंड का प्राकृतिक परिवेश बंगाल की साहित्यिक दुनिया में भी जगह बनाता है।
मधुपुर, देवघर और रांची जैसे स्थान लंबे समय तक बंगालियों के “दूसरे घर” रहे हैं। “चेंजर” शब्द आज भी इस ऐतिहासिक जुड़ाव की याद दिलाता है।
आज भी झारखंड आने वाले पर्यटकों में एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल से आता है। हाल में झारखंड सरकार द्वारा कोलकाता में किए गए पर्यटन प्रचार से यह जुड़ाव और स्पष्ट हुआ है।
पश्चिम बंगाल के औद्योगिक आधार में गिरावट
इतिहास में मजबूत औद्योगिक आधार होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल ने 1960 के दशक से अपनी स्थिति खोनी शुरू कर दी। राजनीतिक अस्थिरता, श्रमिक असंतोष और लगातार हड़तालों ने उद्योगों को प्रभावित किया।
फ्रेट इक्वलाइजेशन नीति ने कच्चे माल की नज़दीकी के लाभ को कम कर दिया, जिससे उद्योग अन्य राज्यों में जाने लगे। धीरे-धीरे बड़े कारोबारी घराने मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों की ओर स्थानांतरित हो गए।
बुनियादी ढांचे की चुनौतियां और आर्थिक उदारीकरण के दौर में धीमी प्रतिक्रिया ने स्थिति को और कमजोर किया। सिंगूर जैसी घटनाओं ने निवेशकों के बीच जोखिम की धारणा को बढ़ा दिया।
झारखंड पर असर
झारखंड के पास भरपूर प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन निवेश आकर्षित करने के लिए केवल संसाधन पर्याप्त नहीं होते। निवेशक एक मजबूत इकोसिस्टम की तलाश करते हैं—कनेक्टिविटी, पोर्ट, वित्तीय ढांचा और कुशल मानव संसाधन।
यह इकोसिस्टम पहले पश्चिम बंगाल के जरिए उपलब्ध था। इसके कमजोर होने से झारखंड की निवेश क्षमता भी प्रभावित हुई।
ओडिशा को फायदा, झारखंड पीछे
पश्चिम बंगाल की औद्योगिक गिरावट का फायदा ओडिशा को मिला। बेहतर नीतियों, तेज़ फैसलों और पारादीप बंदरगाह की उपलब्धता ने उसे निवेश के लिए आकर्षक बना दिया।
अंगुल, झारसुगुड़ा और कलिंगनगर जैसे औद्योगिक क्षेत्र तेजी से विकसित हुए। इसके विपरीत, झारखंड समान संसाधनों के बावजूद निवेश आकर्षित करने में पीछे रह गया।
झारखंड अकेले क्यों नहीं बढ़ सकता
यह मानना कि झारखंड अकेले अपने दम पर विकास कर सकता है, वास्तविकता से दूर है। इसकी अर्थव्यवस्था हमेशा एक व्यापक क्षेत्रीय ढांचे से जुड़ी रही है।
एक उभरता हुआ पश्चिम बंगाल इस ढांचे को फिर से मजबूत कर सकता है—बेहतर कनेक्टिविटी, निवेश और रोजगार के अवसरों के माध्यम से।
बड़ा क्षेत्रीय सवाल
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का महत्व केवल राज्य तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे पूर्वी भारत की आर्थिक दिशा पर पड़ेगा।
कोलकाता का फिर से ‘पूरब का प्रवेश द्वार’ बनना क्षेत्रीय संतुलन बहाल करने के लिए आवश्यक है। इसके बिना, झारखंड जैसे राज्य अपनी क्षमता के बावजूद संघर्ष करते रह सकते हैं।
एक साझा भविष्य
झारखंड का इतिहास—बंगाल प्रेसीडेंसी से लेकर बिहार और फिर एक अलग राज्य बनने तक—पश्चिम बंगाल के साथ उसके गहरे आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है।
इतिहास का सबक स्पष्ट है: जब कोलकाता फला-फूला, तब झारखंड भी आगे बढ़ा। जब उसमें गिरावट आई, तो उसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ा।
आज, जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हो रहे हैं, उनके परिणाम राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक असर डालेंगे। झारखंड के लिए, एक उभरता हुआ और औद्योगिक रूप से सशक्त पश्चिम बंगाल सिर्फ़ वांछनीय नहीं, बल्कि उसके भविष्य के लिए अनिवार्य है।









