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“अटलजी ने कहा था, इस्तीफ़ा दो और झारखंड जाओ”: बाबूलाल मरांडी ने पहले मुख्यमंत्री के रूप में अपने सफ़र को किया याद

Jharkhand Story by Jharkhand Story
12 November 2025
in Breaking, Politics
BJP reaffirms commitment to tribal development as Jharkhand marks silver jubilee
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सुमन श्रीवास्तव

 

रांची, नवंबर 12: झारखंड राज्य के 25 वर्ष पूरे होने के मौके पर राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने अपने राजनीतिक सफ़र को याद किया। अटल बिहारी वाजपेयी के भरोसेमंद सहयोगी से लेकर राजनीतिक वनवास और फिर भाजपा में शीर्ष नेतृत्व की वापसी तक — मरांडी की कहानी झारखंड की राजनीति के उतार-चढ़ावों की झलक पेश करती है।

“अटलजी ने कहा था: इस्तीफ़ा दो और झारखंड जाकर काम करो”

अगस्त 2000 में संसद ने झारखंड राज्य विधेयक पारित किया था। उस समय बाबूलाल मरांडी केंद्र सरकार में वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री थे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्रा का एक फ़ोन आया — जिसने मरांडी की ज़िंदगी की दिशा बदल दी।

मरांडी याद करते हैं, “उन्होंने सिर्फ दो वाक्य कहे — इस्तीफ़ा दो और झारखंड जाकर काम करो। मैंने कोई सवाल नहीं किया। अपने सचिव को बुलाया, इस्तीफ़ा टाइप कराया और तुरंत जमा कर दिया।”

1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में दुमका से शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन को हराने के बाद मरांडी को झारखंड में एक उभरते हुए नेता के रूप में देखा जाने लगा था।

बिरसा मुंडा जयंती बनी स्थापना दिवस

राज्य गठन के बाद जब नेतृत्व और तारीख तय करने की बात आई, तो तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मरांडी से सुझाव मांगा।
मरांडी ने कहा, “मैंने प्रस्ताव रखा कि राज्य को भगवान बिरसा मुंडा को समर्पित किया जाए। इसी वजह से 15 नवंबर, बिरसा मुंडा की जयंती, झारखंड स्थापना दिवस बनी।”

पहले मुख्यमंत्री के चयन के लिए भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने विधायकों से राय ली। मरांडी कहते हैं, “शायद इसी तरह मेरा नाम सामने आया।”
इस पद के अन्य दावेदार वरिष्ठ नेता करिया मुंडा थे। मरांडी के शब्दों में, “वह वरिष्ठ और ईमानदार थे, लेकिन शायद जमीनी जुड़ाव मेरे पक्ष में गया।”

गिरिडीह से रांची तक का सफ़र

गिरिडीह जिले के तिसरी प्रखंड के कोडाईबांक गांव में जन्मे मरांडी संथाल आदिवासी परिवार से हैं। गिरिडीह कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से हुआ, जिसने उनके राजनीतिक जीवन की नींव रखी।

रांची विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन किया, लेकिन जल्द ही नौकरी छोड़ दी और संघ परिवार के कार्यों में जुट गए।
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के झारखंड क्षेत्र संगठन सचिव के रूप में उन्होंने दुमका और संथाल परगना में व्यापक जनसंपर्क किया और स्थानीय समुदायों से गहरे संबंध बनाए।

नए राज्य का युवा मुख्यमंत्री

2000 में झारखंड राज्य के गठन के साथ ही मरांडी ने पहले मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला। वे याद करते हैं, “भाजपा के मंत्रियों का चयन आसान था — सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा गया। लेकिन गठबंधन दलों के कुछ मंत्री प्रक्रियाओं को दरकिनार करना चाहते थे। जब मैंने नियमों पर ज़ोर दिया, तो मतभेद सामने आए। पर मैं अडिग रहा।”

राजनीतिक वनवास और संघर्ष के वर्ष

मरांडी का मुख्यमंत्री कार्यकाल 2003 में समाप्त हो गया। इसके बाद भाजपा से उनके रिश्ते बिगड़ते चले गए। 2006 में उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) की स्थापना की और करीब 14 वर्षों तक राजनीतिक संघर्ष किया।

हालाँकि वे अपने प्रभाव और साफ छवि के कारण लोकप्रिय बने रहे, लेकिन उनकी पार्टी भाजपा या झामुमो को चुनौती नहीं दे सकी।

भाजपा में वापसी और नई भूमिका

2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद 2020 में मरांडी ने अपनी पार्टी को भंग कर भाजपा में वापसी की। उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया, हालांकि स्पीकर द्वारा मान्यता न मिलने से मामला अटक गया।
बाद में भाजपा ने अमर बाउरी को विपक्ष का नेता और मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया।

शीर्ष पर वापसी

2024 के विधानसभा चुनावों में भाजपा सत्ता से दूर रही, लेकिन मरांडी को फिर से राज्य भाजपा का अध्यक्ष और विपक्ष का नेता दोनों जिम्मेदारियाँ दी गईं। यह दोहरी भूमिका इस बात का संकेत है कि केंद्रीय नेतृत्व झारखंड में संगठन को मज़बूत करने के लिए मरांडी पर भरोसा करता है।

अटलजी के “झारखंड जाकर काम करो” निर्देश से लेकर राज्य में भाजपा के 25वें वर्ष में नेतृत्व तक — बाबूलाल मरांडी की यात्रा झारखंड की राजनीति में दृढ़ता, लचीलापन और जनता से गहरे जुड़ाव की प्रतीक रही है।

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