झारखंड: Bargaain जमीन मामले में हाईकोर्ट ने हेमंत सोरेन की अभियोजन मंजूरी वाली दलील खारिज की, PMLA कार्रवाई जारी
SUMAN SHRIVASTAVA रांची, 18 सितंबर: झारखंड हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की 8.86 एकड़ Bargaain जमीन मामले में आगे की PMLA कार्रवाई…
SUMAN SHRIVASTAVA
रांची, 18 सितंबर: झारखंड हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की 8.86 एकड़ Bargaain जमीन मामले में आगे की PMLA कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया आरोपित कृत्यों का उनके आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन से कोई संबंध नजर नहीं आता।
अदालत ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत अभियोजन की पूर्व मंजूरी नहीं होने को इस स्तर पर कार्यवाही रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता। मंजूरी से जुड़ा सवाल ट्रायल के दौरान भी विचार के लिए उठाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां प्रथमदृष्टया हैं और केवल अंतरिम राहत की मांग पर निर्णय लेने तक सीमित हैं। ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार मामले की सुनवाई करेगा और हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगा।
8.86 एकड़ Bargaain जमीन मामले के केंद्र में
मामला रांची के Bargaain स्थित शांति नगर की 8.86 एकड़ जमीन से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह जमीन हेमंत सोरेन के कब्जे और नियंत्रण में थी।
फैसले में दर्ज अभियोजन पक्ष की दलीलों के मुताबिक, कथित भूमि कब्जा सिंडिकेट की जांच के दौरान Bargaain क्षेत्र की जमीन से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कथित हेरफेर और जालसाजी का मामला सामने आया।
जांच के दौरान बरामद सामग्री में “CMO URGENT” अंकित एक फाइल का भी उल्लेख है। अभियोजन पक्ष ने इस फाइल को विवादित जमीन से संबंधित दस्तावेजों और कुछ हस्तलिखित टिप्पणियों से जोड़ा है।
अभियोजन का आरोप है कि उक्त जमीन वर्ष 2010-11 से हेमंत सोरेन के कब्जे में थी। ये आरोप अभियोजन पक्ष के मामले का हिस्सा हैं और ट्रायल में इनकी न्यायिक जांच होनी बाकी है।
बचाव पक्ष ने अभियोजन मंजूरी को बनाया मुख्य आधार
हेमंत सोरेन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Minakshi Arora ने दलील दी कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए CrPC की धारा 197(1) के तहत पूर्व मंजूरी आवश्यक थी।
बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के Directorate of Enforcement vs Bibhu Prasad Acharya & Others फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी लोक सेवक के खिलाफ आरोपित कृत्य उसके आधिकारिक दायित्व से जुड़े हैं, तो धारा 197 का संरक्षण लागू हो सकता है।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि Enforcement Directorate ने राज्यपाल से मंजूरी मांगी थी, लेकिन मंजूरी दिए जाने संबंधी कोई आदेश उसे उपलब्ध नहीं कराया गया। इसी आधार पर आगे की PMLA कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की गई।
हाईकोर्ट: मुख्यमंत्री का पद हर कृत्य को आधिकारिक नहीं बनाता
हाईकोर्ट ने धारा 197 के तहत मिलने वाले संरक्षण की सीमा पर विस्तार से विचार किया। अदालत ने कहा कि यह संरक्षण तभी लागू होता है जब आरोपित कृत्य का सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक दायित्व से उचित और तार्किक संबंध हो।
सिर्फ किसी संवैधानिक या सरकारी पद पर होना हर कथित कृत्य को आधिकारिक दायित्व के निर्वहन का हिस्सा नहीं बना देता।
अदालत ने माना कि किसी कृत्य का आधिकारिक दायित्व से संबंध है या नहीं, यह कई मामलों में कानून और तथ्यों दोनों का सवाल हो सकता है और इसका अंतिम निर्धारण साक्ष्य सामने आने के बाद ट्रायल में किया जा सकता है।
CNT Act के तहत मुख्यमंत्री की भूमिका पर भी हुई चर्चा
हाईकोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act), विशेष रूप से धारा 71-A के प्रावधानों की भी जांच की।
अदालत ने कहा कि आदिवासी जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण की स्थिति में जमीन की बहाली से संबंधित कार्यवाही का अधिकार Deputy Commissioner और Special Regulation Officer के पास है।
अदालत को प्रथमदृष्टया ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान, नियम, निर्देश या कार्यकारी आदेश नहीं मिला, जिसके तहत मुख्यमंत्री के पद को संबंधित Register-II प्रविष्टियों या विवादित जमीन से जुड़े SAR proceedings में हस्तक्षेप का अधिकार प्राप्त हो।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना कि अभियोजन में वर्णित कथित कृत्यों का मुख्यमंत्री के आधिकारिक दायित्व से संबंध स्थापित नहीं होता।
ED ने मंजूरी के आधार पर रोक का किया विरोध
Enforcement Directorate ने हेमंत सोरेन की याचिका का विरोध किया।
ED की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Amit Kumar Das ने दलील दी कि केवल मुख्यमंत्री का पद धारण करने के कारण कथित तौर पर किए गए हर कृत्य को आधिकारिक कार्य नहीं माना जा सकता।
जांच एजेंसी के अनुसार, मामले में जिन कृत्यों का आरोप लगाया गया है, वे राजस्व रिकॉर्ड और जमीन से जुड़ी कार्यवाही को कथित रूप से प्रभावित करने से संबंधित हैं, जबकि इन मामलों में मुख्यमंत्री के पद को कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
Bargaain जमीन के रिकॉर्ड में कथित हेरफेर
फैसले में दर्ज अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, Bargaain क्षेत्र की जमीन से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की गई।
जांच में 8.86 एकड़ जमीन से संबंधित दस्तावेजों और उसकी स्थिति को लेकर कई पहलुओं की पड़ताल की गई। अभियोजन पक्ष ने SAR Case No. 81/2023-24 से जुड़ी कार्यवाही का भी उल्लेख किया है।
अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि अभियोजन की ओर से लगाए गए इन आरोपों का अंतिम निर्धारण ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अलग बताया मामला
बचाव पक्ष ने Directorate of Enforcement vs Bibhu Prasad Acharya & Others मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने पक्ष में प्रमुख आधार बनाया था।
हाईकोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में धारा 197 का प्रावधान PMLA से जुड़ी कार्रवाई में भी लागू हो सकता है, यदि संबंधित लोक सेवक की कथित गतिविधि उसके आधिकारिक दायित्व से जुड़ी हो।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले के तथ्यों को अलग माना। अदालत के अनुसार, Bargaain जमीन से जुड़े आरोपित कृत्य प्रथमदृष्टया मुख्यमंत्री के पद से जुड़े किसी वैधानिक कार्य के निर्वहन से संबंधित नहीं दिखते।
हाईकोर्ट ने रोक से किया इनकार
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के तहत मंजूरी नहीं होने की दलील इस स्तर पर PMLA कार्रवाई पर रोक लगाने का आधार नहीं बनती।
अदालत ने प्रथमदृष्टया माना कि आरोपित कृत्यों और आधिकारिक दायित्व के बीच कोई संबंध नहीं है और मंजूरी के अभाव से ऐसा कोई पूर्वाग्रह भी स्थापित नहीं हुआ, जिसके आधार पर कार्यवाही रोकना जरूरी हो।
इसके साथ ही हेमंत सोरेन की अंतरिम राहत की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई और सक्षम अदालत के समक्ष मामले की कार्रवाई कानून के अनुसार जारी रखने का रास्ता साफ हो गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने दोहराया कि आदेश में की गई टिप्पणियां प्रथमदृष्टया हैं और ट्रायल कोर्ट मामले के गुण-दोष पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेगा।
मामले को संबंधित आपराधिक याचिका के साथ 14 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।

