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मासिक धर्म स्वच्छता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, झारखंड-बिहार के आंकड़ों में मिली गड़बड़ी

द झारखंड स्टोरी नेटवर्क नई दिल्ली, 16 सितंबर: स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी सुविधाओं को लेकर राज्यों और केंद्र शासित…

मासिक धर्म स्वच्छता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, झारखंड-बिहार के आंकड़ों में मिली गड़बड़ी

द झारखंड स्टोरी नेटवर्क

नई दिल्ली, 16 सितंबर: स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी सुविधाओं को लेकर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की अनुपालन रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि कुछ राज्यों की रिपोर्ट महज औपचारिकता जैसी प्रतीत होती हैं और जमीनी स्थिति को सही तरीके से नहीं दर्शातीं।

Justice JB Pardiwala और Justice R Mahadevan की पीठ ने Jaya Thakur v. Government of India & Ors., 2026 मामले में अपने पूर्व के फैसले के अनुपालन की निगरानी करते हुए केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे पर विचार किया। पीठ ने कहा कि पर्याप्त प्रगति हुई है, लेकिन मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार को सार्थक बनाने के लिए अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

कोर्ट की टिप्पणियां झारखंड और बिहार के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि दोनों राज्यों सहित कई राज्यों के मासिक धर्म अपशिष्ट निस्तारण से जुड़े आंकड़ों में विसंगतियां पाई गई हैं।

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राज्यों की अनुपालन रिपोर्ट पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले केंद्र सरकार की ‘Menstrual Hygiene Policy for School-going Girls’ को पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया था। यह नीति कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली किशोरियों के लिए स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी सुविधाएं सुनिश्चित करने से संबंधित है।

निर्देशों के तहत सरकारी और निजी, दोनों तरह के स्कूलों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यशील एवं अलग-अलग शौचालय, उपयोग योग्य पानी की सुविधा, गोपनीयता और दिव्यांग बच्चों के लिए सुगम व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया था।

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इसके अलावा स्कूलों में साबुन और पानी के साथ हाथ धोने की सुविधा, छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन तथा Menstrual Hygiene Management (MHM) corners उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया था।

1 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में पीठ ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार से अनुपालन को लेकर प्राप्त रिपोर्टों की समीक्षा की।

केंद्र सरकार के हलफनामे के अनुसार, कार्यशील बनाए जाने के लिए चिन्हित 39,439 बालिका शौचालयों में से 30,458 का निर्माण पूरा हो चुका था, 4,236 निर्माणाधीन थे और 4,745 की कमी बनी हुई थी।

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल आंकड़े पेश कर देना पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “We are discontent with the manner in which compliance is reported. The response by some States exhibit non-application of mind or rather mere formality.” पीठ ने कहा कि कुछ राज्यों ने जहां विस्तृत जवाब अपेक्षित था, वहां केवल आंकड़ों या हां/नहीं के जवाब के जरिए अनुपालन दर्शाया।

कई राज्यों के आंकड़ों में विसंगतियां

कोर्ट ने अनुपालन रिपोर्ट में कई तरह की विसंगतियों का उल्लेख किया।

कुछ राज्यों ने शौचालयों की पूरी उपलब्धता का दावा किया, जबकि विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए सुलभ शौचालयों की संख्या स्कूलों की कुल संख्या से कम थी। कोर्ट ने Assam के हाथ धोने की सुविधाओं के आंकड़ों और Tamil Nadu द्वारा जेंडर-सेग्रिगेटेड शौचालयों की उपलब्धता को लेकर किए गए दावों पर भी सवाल उठाए।

पीठ ने Karnataka, Jammu & Kashmir, Odisha और Arunachal Pradesh में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों और सैनिटरी उत्पादों की पूर्ण उपलब्धता के दावों पर भी सवाल उठाया, क्योंकि रिपोर्ट किए गए आंकड़े स्कूलों की कुल संख्या से कम थे।

मासिक धर्म अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था से जुड़े आंकड़ों में Bihar, Gujarat, Delhi, Jharkhand, Rajasthan और Uttar Pradesh में भी विसंगतियां पाई गईं। वहीं Punjab की रिपोर्ट पढ़ने योग्य नहीं थी।

कोर्ट ने विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए सुविधाओं को लागू करने में अधिक सतर्कता बरतने पर जोर दिया।

अब उपलब्धियों के बजाय कमियों की रिपोर्ट देनी होगी

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के तरीके में बदलाव का निर्देश दिया है।

अब रिपोर्ट में केवल हासिल की गई उपलब्धियों का उल्लेख करने के बजाय उन स्कूलों की संख्या बतानी होगी जहां अभी भी कार्यशील जेंडर-सेग्रिगेटेड शौचालय, उपयोग योग्य पानी, पर्याप्त गोपनीयता और सुगम सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

इसके अलावा सैनिटरी उत्पादों की उपलब्धता, अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था, प्रत्येक कमी के कारण और उसे दूर करने में लगने वाले समय का भी उल्लेख करना होगा।

जिला शिक्षा अधिकारी कराएंगे स्कूलों का औचक निरीक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए जिला स्तर पर व्यवस्था को भी मजबूत किया है।

अब District Education Officers (DEOs) को अपने-अपने जिलों के सभी स्कूलों के औचक निरीक्षण के लिए शिक्षकों की टीमें गठित करने का निर्देश दिया गया है। निरीक्षण के दौरान शौचालय, पानी, सैनिटरी उत्पाद, अपशिष्ट निस्तारण और अन्य संबंधित सुविधाओं की स्थिति की जांच की जाएगी।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन निरीक्षणों से सामने आए निष्कर्षों तथा छात्रों से मिले फीडबैक को भी अगली अनुपालन रिपोर्ट में दर्ज करना होगा।

सैनिटरी नैपकिन के मानक में बदलाव

मासिक धर्म से निकलने वाले कचरे और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में उपलब्ध कराए जाने वाले सैनिटरी नैपकिन की प्रकृति से जुड़े निर्देश में भी बदलाव किया है।

पहले निर्धारित “oxo-biodegradable sanitary napkins manufactured in compliance with the ASTM D-6954 standards” की जगह अब “biodegradable, biocompatible and compostable sanitary napkins in compliance with ISO 17088 read with IS 5405 standards” की आवश्यकता होगी।

पीठ ने राज्यों से अधिक पर्यावरण-अनुकूल और वैज्ञानिक रूप से मान्य मासिक धर्म उत्पादों की ओर धीरे-धीरे बढ़ने को भी कहा है। इनमें biodegradable sanitary napkins, cloth-based या reusable sanitary napkins, menstrual cups और period panties शामिल हैं।

मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी।

 

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Suman Shrivastava