म्यूटेशन से जमीन का मालिकाना हक तय नहीं हो सकता: झारखंड हाईकोर्ट
सुमन श्रीवास्तव , 15 सितंबर: झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि म्यूटेशन कार्यवाही का उद्देश्य मुख्य रूप से सरकारी भू-राजस्व रिकॉर्ड…
सुमन श्रीवास्तव
, 15 सितंबर: झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि म्यूटेशन कार्यवाही का उद्देश्य मुख्य रूप से सरकारी भू-राजस्व रिकॉर्ड को अद्यतन करना है। राजस्व अधिकारी म्यूटेशन की कार्यवाही के दौरान किसी जमीन पर अधिकार, स्वामित्व और हित से जुड़े गंभीर विवाद का फैसला नहीं कर सकते।
मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने रांची के मौजा-गुंडू में 5.13 एकड़ जमीन से जुड़े विवाद में Rabert Anthony Barla @ Robert Anthony Barla की ओर से दायर अपील पर यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने 15 अक्टूबर 2025 को एकल पीठ द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया और निजी प्रतिवादियों को संबंधित जमीन को लेकर लंबित टाइटल सूट में सक्षम सिविल कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता दी।
म्यूटेशन राजस्व रिकॉर्ड के लिए, मालिकाना हक तय करने के लिए नहीं
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि म्यूटेशन कार्यवाही का उद्देश्य बिक्री, उपहार, उत्तराधिकार या अन्य मान्य माध्यम से संपत्ति के हस्तांतरण के बाद सरकारी भू-राजस्व रिकॉर्ड में नए मालिक का नाम दर्ज करना है।
अदालत ने कहा कि म्यूटेशन की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और इसका उद्देश्य राजस्व संबंधी है। यदि जमीन के अधिकार, स्वामित्व और हित को लेकर आवेदक तथा आपत्तिकर्ताओं के बीच गंभीर विवाद हो, तो पक्षकारों को उचित राहत के लिए सिविल कोर्ट का रुख करना चाहिए।
अदालत ने यह भी दोहराया कि केवल म्यूटेशन से किसी व्यक्ति को जमीन का मालिकाना हक हासिल नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए खंडपीठ ने कहा कि म्यूटेशन सामान्यतः जमीन पर कब्जे के आधार पर राजस्व वसूली के उद्देश्य से किया जाता है और म्यूटेशन या उसके रद्द होने से वास्तविक मालिक का अधिकार और स्वामित्व समाप्त नहीं होता।
मामला उत्तराधिकार म्यूटेशन से जुड़ा
यह मामला रांची के थाना-हटिया क्षेत्र के मौजा-गुंडू की जमीन से जुड़ा है। यह जमीन 26.53 एकड़ के बड़े भूखंड का हिस्सा थी, जिसे विरोनिका तिर्की ने 1944 में खरीदा था। बाद में उन्होंने 8.80 एकड़ जमीन रोमन कैथोलिक मिशन को उपहार में दे दी थी। शेष 17.73 एकड़ जमीन का उनके चार बेटों के बीच पारिवारिक व्यवस्था के तहत बंटवारा हुआ।
विवादित 5.13 एकड़ जमीन जॉन फ्रांसिस कुजूर के हिस्से में आई। वर्ष 1989 में उनकी मृत्यु के बाद 1992 में उक्त जमीन का उत्तराधिकार म्यूटेशन उनकी पत्नी डॉ. लुईसा बारला कुजूर के नाम किया गया।
डॉ. लुईसा बारला कुजूर की मृत्यु के बाद अपीलकर्ता ने उत्तराधिकार के आधार पर जमीन का म्यूटेशन अपने नाम कराने के लिए आवेदन दिया। नामकुम के अंचल अधिकारी ने जनवरी 2017 में आवेदन स्वीकार करते हुए म्यूटेशन उनके पक्ष में कर दिया। इसके बाद म्यूटेशन अपील और पुनरीक्षण की कार्यवाही में भी उनके पक्ष में आदेश पारित हुए।
एकल पीठ के आदेश में तथ्यात्मक त्रुटि
खंडपीठ ने पाया कि एकल पीठ ने यह मान लिया था कि विवादित जमीन का म्यूटेशन अपीलकर्ता के नाम “ट्रांसफर म्यूटेशन” के तौर पर किया गया था।
खंडपीठ ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि आवेदन वास्तव में “सक्सेशन म्यूटेशन” यानी उत्तराधिकार म्यूटेशन के लिए था। आवेदन की प्राप्ति रसीद में भी इसे उत्तराधिकार म्यूटेशन बताया गया था। बाद में जारी करेक्शन स्लिप में भी “By Succession” दर्ज था।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि 2017 के म्यूटेशन आदेश में “sale” और “sale deed” जैसे शब्दों का उल्लेख टाइपिंग संबंधी या अनजाने में हुई त्रुटि प्रतीत होता है।
राजस्व अधिकारियों ने अपीलकर्ता के मैट्रिक प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड और विवाह प्रमाणपत्र समेत कई दस्तावेजों पर भी विचार किया था और डॉ. लुईसा बारला कुजूर के साथ उनके संबंध के संबंध में प्रथमदृष्टया राय बनाई थी। साथ ही अधिकारियों ने यह भी माना था कि पक्षकारों के बीच अधिकार, स्वामित्व और हित का विवाद म्यूटेशन कार्यवाही में तय नहीं किया जा सकता।
मालिकाना हक का विवाद सिविल कोर्ट में तय होगा
निजी प्रतिवादियों ने आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता डॉ. लुईसा बारला कुजूर के दत्तक पुत्र नहीं हैं और उन्होंने कथित तौर पर राजस्व अधिकारियों को गुमराह कर जमीन का म्यूटेशन अपने नाम करा लिया। उनका यह भी दावा था कि डॉ. लुईसा बारला कुजूर की कोई संतान नहीं थी और विवादित जमीन पर उनका अधिकार है।
हाईकोर्ट ने म्यूटेशन कार्यवाही के दौरान इन परस्पर विरोधी मालिकाना दावों का फैसला नहीं किया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए निजी प्रतिवादियों को लंबित टाइटल सूट में सिविल कोर्ट के समक्ष अपना दावा रखने की स्वतंत्रता दी।
इस फैसले से म्यूटेशन और मालिकाना हक के बीच अंतर एक बार फिर स्पष्ट हुआ है। म्यूटेशन के जरिए राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज किया जा सकता है, लेकिन जमीन के स्वामित्व को लेकर गंभीर विवाद का अंतिम फैसला सक्षम सिविल कोर्ट ही कर सकता है।


